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प्रभारी की नियुक्ति करना राजभवन का अधिकार, कानूनविद ने कहा- सुप्रीम कोर्ट का आदेश सर्वाेपरि

टीएमबीयू में प्रभारी वीसी की नियुक्ति पर उठा विवाद थम नहीं रहा है। डीन, हेड, पूर्व एसओ के विराेध के बीच साेशल मीडिया पर भी मुद्दा बहस का विषय बना हुआ है। इस बीच इस विवाद पर प्रभारी वीसी के इस दावे पर भी सवाल उठने लगा है कि कुलाधिपति काे किसी काे भी प्रभार देने का अधिकार है।

अपनी नियुक्ति पर उठ रहे सवाल पर डाॅ. चाैधरी ने टीएमबीयू के पीआरओ के जरिए पक्ष रखा था कि बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1976 की धारा 13 (2) में कहा गया है कि नियमित वीसी और प्राेवीसी के नहीं रहने पर कुलाधिपति किसी काे भी प्रभार दे सकते हैं। इसलिए डाॅ. चाैधरी काे प्रभार मिलना सही है।

लेकिन टीएमबीयू के पूर्व प्रभारी वीसी प्राे. एलसी साहा सहित पूर्व डीन डाॅ. बहादुर मिश्र, स्नातककाेत्तर हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डाॅ. याेगेन्द्र, पीजी अंबेडकर विचार विभाग के हेड डाॅ. विलक्षण रविदास, टीएनबी काॅलेज के पूर्व एसओ अमरेन्द्र झा ने इस नियुक्ति काे यह कहकर गलत बताया कि सुप्रीम काेर्ट ने 2013 में ऐसे ही मामले में वरीयतम डीन काे प्रभार देने की व्यवस्था दी थी और इसके बाद से राज्यभर के विवि में वरीयतम डीन काे प्रभार मिलता रहा है।

काेर्ट की व्यवस्था ही लागू हाेनी चाहिए
अब कानून के जानकार भी कह रहे हैं कि सुप्रीम काेर्ट का आदेश सर्वाेपरि है। कानूनविद आनंद श्रीवास्तव ने कहा कि बिहार राज्य विश्वविद्यालय एक्ट 1976 का है और सुप्रीम काेर्ट ने 2013 में व्यवस्था दी। एक्ट के बाद यह व्यवस्था आई और वह भी सुप्रीम काेर्ट की ओर से। इसलिए काेर्ट की व्यवस्था ही लागू हाेनी चाहिए। ऐसा नहीं हाेने पर काेर्ट की अवमानना का मामला बनता है। दूसरी तरफ पीआरओ के कुलाधिपति काे किसी काे भी प्रभार देने का अधिकार है वाले बयान पर पूर्व छात्र नेता साैरभ झा ने कहा है कि पीआरओ बताएं कि क्या कुलाधिपति वरीयतम डीन या प्राेफेसर काे नजरअंदाज कर किसी काे भी प्रभार दे सकते हैं।



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