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5 वर्ष से कम आयु के शिशुओं में होने वाली मौतों में 70 फीसद हिस्सा नवजात मृत्यु दर का

फैसिलिटी एवं सामुदायिक स्तर पर नवजात शिशुओं को प्रदान की जाने वाली बेहतर देखभाल से ही बिहार के शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। लेकिन अभी भी कई स्तर पर सुधार लाने की जरूरत है। उक्त बातें राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक मनोज कुमार ने बुधवार को राष्ट्रीय नवजात सप्ताह के ई-लांच एवं वर्चुअल उन्मुखीकरण के दौरान कही।

उन्होंने बताया कि 5 वर्ष से कम आयु के शिशुओं में होने वाली मौतों में 70% हिस्सा नवजात मृत्यु दर का होता है। इसलिए नवजात देखभाल की जरूरत अधिक है। कार्यपालक निदेशक मनोज कुमार ने वेबिनार के माध्यम से बताया कि बिहार का शिशु मृत्यु दर 3 अंक घटकर राष्ट्रीय औसत के बराबर हो गया है। 2017 में बिहार की शिशु मृत्यु दर 35 थी, जो वर्ष 2018 में घटकर 32 हो गई। राज्य स्तर पर स्वास्थ्य कार्यक्रमों की बेहतर क्रियान्वयन से ही यह संभव हो सका है। उन्होंने बताया कि शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए प्रसव पूर्व प्रैक्टिसेज, बर्थ एक्स्फिक्सिया, सेप्सिस एवं सुरक्षित प्रसव पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

फैसिलिटी बेस्ड इन सेवाओं की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने का निर्देश
उन्होंने बताया कि नवजातों को बेहतर इलाज प्रदान करने एवं रोग प्रबंधन में एसएनसीयू(स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट), एनबीसीसी( न्यू बोर्न केयर कार्नर) एवं एनबीएसयू( न्यू बोर्न केयर स्टेबलाइजेशन यूनिट) की भूमिका बहुत अहम है। इसलिए यह जरुरी है कि फैसिलिटी बेस्ड इन सेवाओं की गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जाए। वेबिनार को संबोधित करते राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी बाल स्वास्थ्य डॉ. वीपी राय ने बताया कि राष्ट्रीय नवजात सप्ताह के आयोजन का मुख्य उद्देश्य नवजात देखभाल में होलिस्टिक एप्रोच को शामिल करना है, जिसमें शिशु जन्म के समय बेहतर देखभाल, शुरूआती स्तनपान एवं 6 माह तक सिर्फ स्तनपान, नाभी की देखभाल(गर्भ नाल को सूखा रखना), नवजातों में खतरे के संकेत की पूर्व पहचान, कंगारू मदर केयर एवं गृह आधारित शिशु देखभाल शामिल है।

नवजातों की स्क्रीनिंग के साथ-साथ लेबर रूम एवं डिलीवरी प्वाइंट का होगा रिव्यू
वेबिनार के दौरान राज्य स्वास्थ्य समिति के सहायक निदेशक, बाल स्वास्थ्य एवं पोषण, विमलेश कुमार सिन्हा ने बताया कि राष्ट्रीय नवजात सप्ताह की थीम-‘एन्स्युरिंग क्वालिटी, इक्विटी एंड डिग्निटी फॉर न्यूबोर्न केयर ऐट एवेरी हेल्थ फैसिलिटी एंड एवेरीवेयर’’ रखी गयी है। वहीं जिला स्तर पर एसएनसीयू द्वारा नवजातों की फोन पर फालोअप, डीईआईसी पर नवजातों की स्क्रीनिंग एवं कोविड काल में लेबर रूम एवं डिलीवरी पॉइंट का रिव्यु आदि गतिविधियां की जाएगी।

शुरुआती स्तनपान से नवजात मृत्यु दर में लाई जा सकती है 22 प्रतिशत की कमी
यूनिसेफ के हेल्थ स्पेशलिस्ट डॉ. सैय्यद हुबे अली ने बताया कि विश्व भर में भारत में सबसे अधिक 54900 नवजातों की मौत होती है जो कुल मौतों का 22% है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल के तहत वर्ष 2030 तक नवजात मृत्यु दर को प्रति 1000 जीवित जन्म 12 करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लिए शुरूआती नवजात मौतों में कमी लाना बेहद जरुरी है। क्योंकि लगभग 80% नवजातों की मौत शिशु जन्म के 7 दिनों के भीतर ही होती है। वहीं 40% नवजातों की मौत प्रसव के दौरान या जन्म के 24 घंटों के भीतर हो जाती है। उन्होंने बताया कि जन्म के 1 घंटे के भीतर नवजात का स्तनपान शुरू करने से नवजात मृत्यु दर में 22प्करतिशत एवं पांच साल से कम आयु वर्ग के बच्चों की मृत्यु दर में 13प्रतिशत की कमी लायी जा सकती है।



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